श्रीमद्भगवद्गीता में स्थितप्रज्ञता
सौदामिनी गुप्ता1, शशिकांत मणि त्रिपाठी2
1पीएचडी योग स्कॉलर, सैम ग्लोबल यूनिवर्सिटी भोपाल, मध्यप्रदेश, भारत।
2एसोसिएट प्राध्यापक, योग विभाग, सैम ग्लोबल यूनिवर्सिटी भोपाल, मध्यप्रदेश, भारत।
*Corresponding Author E-mail: soudamini.saha@gmail.com
ABSTRACT:
मनुष्य की सफलता उसके चिंतन और क्रिया दोनों पर निर्भर करता है। जब उसके चिंतन और क्रिया दोनों एक होते हैं तभी उसे सफलता मिलती है। सफल व्यक्ति अपना आत्मविश्वास कभी भी नहीं खोता। अपना मानसिक संतुलन कभी नहीं खोता। वह शक्ति सम्पन्न व्यक्ति होता है। उसके पास मानसिक शक्ति एवं संकल्प बल होता है। सफल व्यक्ति कभी भी हार नहीं मानता और संघर्ष करने से भी नहीं घबराता है। ऐसा नहीं है कि वह कभी हारता नहीं है पर वह अपनी योग्यता से उस हार को जीत में बदल देता है। उसके अंदर हमेशा सकारात्मक विचार उत्पन्न होते हैं। ऐसा मनुष्य ही स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की श्रेणी में आता है।
KEYWORDS: श्रीमद्भगवद्गीता, स्थितप्रज्ञ।
INTRODUCTION:
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने स्थितप्रज्ञ का अर्थ प्रज्ञा में स्थिर होना बताया है। उन्होंने अर्जुन से स्थितप्रज्ञ मनुष्य के विषय में विस्तृत रूप में वर्णन किया है और स्थितप्रज्ञ की स्थिति को प्राप्त करने के लिए योग का आश्रय लेने के लिए कहा है। वे जब अर्जुन को योग अर्थात् समाधि भाव में स्थित होने को कहते हैं तो अर्जुन के मन में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि स्थितप्रज्ञ’के लक्षण क्या हैं? स्थिरबुद्धि पुरुष के विषय में उत्पन्न चार प्रश्नों में से पहले प्रश्न को भगवान केशव से पूछते हुए कुन्तीपुत्र अर्जुन श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में कहते हैं -
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम ।।1
अर्थात् अर्जुन बोले - हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
बुद्धि के सभी संकल्प- विकल्प, सभी कामनाएँ एवं आसक्ति, इन सबका मिट जाना तथा अपने स्वरुप में स्थित हो जाना स्थितप्रज्ञता है। स्थिरप्रज्ञता में सामान्यतः दो भेद किए जा सकते हैं-
1. बुद्धि में स्थित
2. समाधि में स्थित
समाधि अर्थात् आत्मा में स्थित होना। ऐसी स्थिति का केवल संकेत ही किया जा सकता है। इस श्लोक में अर्जुन का प्रश्न है कि समाधिस्थ व्यक्ति के क्या लक्षण हैं और जब वह समाधि स्थिति से नीचे उतरता है तो किस प्रकार के उसके क्रियाकलाप होते हैं? अतः स्थितप्रज्ञता को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है -
स्थितप्रज्ञता के लक्षण:-
स्थिरबुद्धि पुरुष के सम्बन्ध में अर्जुन के पहले प्रश्न का उत्तर देते हुए स्थिरबुद्धि पुरुष को समस्त कामनाओं से रहित तथा आत्मा में ही संतुष्ट बतलाते हुए भगवान कृष्णगोपाल श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में स्थितप्रज्ञता के लक्षण बताते हुए अपनी प्रेममयी वाणी में कहते हैं -
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ।।2
अर्थात् हे पार्थ! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभांति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
प्रस्तुत श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण कामनाओं के त्याग की बात कहते हैं। जब मनुष्य मन में स्थित हृदय में प्रविष्ट सम्पूर्ण कामनाओं को सारे इच्छा भेदों को भली प्रकार त्याग देता है, छोड़ देता है तथा अंतःकरण में स्थित समस्त कामनाओं का सर्वथा अभाव हो जाने पर शुद्ध-बुद्ध परमात्मा के यथार्थ स्वरूप का साक्षात्कार हो जाने पर जो मनुष्य उसी परमात्मा में लीन हो जाता है, आत्मा से आत्मा में संतुष्ट हो जाता है, तब वह मनुष्य स्थितप्रज्ञ कहलाता है। महर्षि पतंजलि ने इसे दृष्यनुश्रविक वैराग्य‘कहा है अर्थात् जो कुछ हम संसार में देख रहे हैं और जो कुछ स्वर्ग, सिद्धि, मुक्ति, आनंद आदि के बारे में सुना है, उन सभी कामनाओं का त्याग करके केवल अपने में अर्थात् आत्मभाव में संतुष्ट रहने का नाम स्थितप्रज्ञ है।
आचार्य शंकर ने भी कहा है दृ “लोक की समस्त तृष्णाओं को त्याग देने वाला संन्यासी ही आत्माराम, आत्मक्रीड और स्थितप्रज्ञ है।“3
डॉ. प्रणव पंड्या के शब्दों में जो परमात्म सत्ता में अधिष्ठित हो वही स्थितप्रज्ञ है ... कामनाओं से उबरकर आत्मा के सुख में विचरण करने वाला व्यक्ति स्थितप्रज्ञ है।“4
यहाँ स्थितप्रज्ञ के दो लक्षण उभरते हैं -
1. प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् अर्थात् सम्पूर्ण कामनाओं का त्याग।
2. आत्मन्येवात्मना तुष्टः अर्थात् आत्मा से आत्मा में अर्थात् आपने मूल स्वरूप में ही संतुष्ट रहे।
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति बोलता कैसे है?
स्थिरबुद्धि पुरुष को दुःखों में विचलित न होनेवाला, सुखों में इच्छारहित और शुभ-अशुभ की प्राप्ति में हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वों से रहित बतलाकर स्थिरबुद्धि पुरुष के सम्बन्ध अर्जुन के दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान वासुदेव श्रीमद्भगवद्गीता के अगले श्लोक में अपने कृपादायक स्वर में कहते हैं -
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ।।5
अर्थात् दुःखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता, सुखोंकी प्राप्ति में जो सर्वथा निस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है।
स्थिरबुद्धि बोलता कैसे है यह बताने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण ने क्रिया की अपेक्षा भाव जोर दिया है। उनका कहना है कि जो दुखों की प्राप्ति होने पर परेशान एवं विचलित नहीं होता, सुखों को तथा उनसे संबंधित वस्तुओं को पाने की जिसकी लालसा नहीं है तथा जिसके राग अर्थात् सुखों को पाने की लालसा, भय अर्थात् सुख के साधनों में विघ्न पड़ने का भय तथा क्रोध, ये तीनों भाव जिसके अन्दर से समाप्त हो गए हैं वह मनुष्य स्थिरबुद्धि है अर्थात् स्थिरबुद्धि व्यक्ति राग, भय और क्रोध आदि भावों से मुक्त वाणी बोलता है। उसका अंतःकरण पूर्णतः शुद्ध होता है।
डॉ. प्रणव पंड्या के अनुसार - “स्थितप्रज्ञ बनने की पहली सीढ़ी है सुख को योग दुःख को तप बना लेना।”6
भगवान् श्रीकृष्ण अगले श्लोक में अपने मधुर स्वर में कहते हैं -
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।7
अर्थात् जो पुरुष सर्वत्र स्नेह रहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है उसकी बुद्धि स्थिर है।
जिस प्रकार सांसारिक मनुष्य अपने स्त्री, पुत्र, भाई, मित्र और कुटुंब वालों में ममता और आसक्ति रखते हैं, दिन-रात उनकी समस्त इच्छाओं को पूरा करने में लगे रहते हैं उनमें आसक्त रहते हैं स्थिरबुद्धि योगी ऐसा नहीं करता। उसका किसी भी प्राणी में ममता व आसक्ति नहीं रहता। कहने का तात्पर्य यह है कि जो हर जगह स्नेह रहित है, किसी से लगाव व आसक्ति नहीं है तथा जो शुभ अर्थात् अनुकूल वस्तुओं या परिस्थितियों की प्राप्ति पर हर्षित नहीं होता तथा दुखद घटनाओं, स्थितियों, निंदा आदि से दुखी या विचलित नहीं होता तथा जो ऐसा होने पर किसी की प्रशंसा या किसी की निंदा नहीं करता, वह स्थितप्रज्ञ है।
आचार्य श्रीधर कहते हैं - “जो सर्वत्र स्नेह शून्य है, आसक्ति रहित है, अनुकूल वस्तु पाने पर अभिनन्दन नहीं करते, प्रतिकूल वस्तु पाकर द्वेष या निंदा नहीं करते बल्कि उदासीन के समान बातें करते हैं, उनकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है।”8
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति बैठता कैसे है?
स्थिरबुद्धि पुरुष के सन्दर्भ में अर्जुन के तीसरे प्रश्न के उत्तर में कछुए के उदाहरण द्वारा इन्द्रिय - निग्रह की बात बतलाते हुए जगत नियन्ता भगवान मधुसूदन श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में अपने ज्ञान से ओत-प्रोत स्वर में कहते हैं -
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।9
अर्थात् जिस तरह कछुआ अपने अंगों को सब ओरसे समेट लेता है, वैसे ही यह पुरुष इन्द्रियों के विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।
यहाँ भगवान् यह कहते हैं कि स्थितप्रज्ञ अपने समस्त इन्द्रियों को विषयों से हटा लेता है तथा मन के द्वारा भी उनका चिंतन नहीं करता, जैसे कि कछुआ अपने हाथ पैरों को समेत लेता है अर्थात् विषयों से किंचित मात्र भी मानसिक सम्बन्ध न रहना स्थितप्रज्ञ के लक्षण हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन पाँचों की आसक्ति से परे होता है।
डॉ. प्रणव पंड्या कहते हैं - “स्थितप्रज्ञ को इन्द्रियों को चित्त में, चित्त को अहं में, अहं को आत्मा में, एवं आत्मतत्व को परमात्म तत्व में सिकोड़ने की प्रक्रिया में निष्णात होना चाहिए। .... मात्र इन्द्रियों को न ग्रहण करने वाले पुरुषों के केवल विषय निवृत्त हो जाते हैं। मगर आसक्ति बनी रहती है। स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति से भी निवृत्ति हो जाती है।”10
इन्द्रियों द्वारा हठपूर्वक विषयों का ग्रहण न करने से विषयों की निवृत्ति होने पर भी राग की निवृत्ति न होने का और परमात्मदर्शन होने का कथन अर्जुन को स्पष्ट करते हुए भगवान पुण्डरीकाक्ष अगले श्लोक में कहते हैं -
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते ।।11
अर्थात् इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितिप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है।
निराहारस्य’का अर्थ है संसार में रहकर भोजन का त्याग कर देना। परन्तु यहाँ इसका अर्थ है इन्द्रियों का अपने आहार अर्थात् विषयों का त्याग कर देना, विषयों से निवृत्त हो जाना। भोजन के त्याग से केवल जिव्हा इन्द्रिय के विषय की निवृत्ति होती है। शब्द, स्पर्श, रूप एवं गंध की निवृत्ति नहीं होती। जिस इन्द्रिय का जो विषय है वही उसका आहार है। इस तरह सभी इन्द्रियों के द्वारा सभी विषयों का ग्रहण करना त्याग देता है ऐसा देहाभिमानी मनुष्य का वाचक यहाँ ‘निराहारस्य देहिनः’कहा गया है। ऐसे मनुष्य के भी केवल इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले विषय तो मिट जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति बनी रहती है, ऐसे स्थिर बुद्धि वाले मनुष्य की आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके मिट जाती है।
इन्द्रियों की प्रबलता का निरूपण करते हुए भगवान गोविन्द श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में अर्जुन को अपनी ज्ञानवाणी से चमत्कृत करते हुए अगले श्लोक में कहते हैं -
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ।।12
अर्थात् हे कौन्तेय! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियां यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को बलात हर लेती है।
भगवान् इस श्लोक में पुनः कहते हैं कि आसक्ति का नाश न होने पर इन्द्रियां मन को बलपूर्वक विषयों की ओर खींच लेती हैं और मानवी मन पुनः विचलित हो विषयों की ओर, संसार की ओर दौड़ पड़ती हैं। इन्द्रियों द्वारा विषयों का त्याग करने से पुरुष के केवल विषय ही निवृत्त होते हैं, उनमे उनका राग निवृत्त नहीं होता। इसलिए जब तक मनुष्य की विषयों में आसक्ति बनी रहती है, तब तक उस आसक्ति के कारण उसकी इन्द्रियां बलपूर्वक उसे विषयों में प्रवृत्त कर देती हैं।
मन और इन्द्रियों को संयमपूर्वक भगवत्परायण करने की प्रेरणा देते हुए तथा इन्द्रियविजयी पुरुष की प्रशंसा करते हुए भगवान वासुदेव श्रीमद्भगवद्गीता के अगले श्लोक में पुनः अर्जुन को अपने सुमधुर स्वर में कहते हैं -
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।13
अर्थात् इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे, क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियां वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है।
समस्त इन्द्रियों को वश में करने की आवश्यकता पर बल देते हुए भगवान् पद्मनाभ कहते हैं - कर्मयोगी साधक उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके मेरे परायण होकर बैठे क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है। क्योंकि वश में न की हुई एक भी इन्द्रिय मनुष्य के मन को विचलित कर देती है, जिससे साधना में विघ्न उत्पन्न हो जाता है। इसलिए परमात्मा की प्राप्ति की इच्छा रखने वाले मनुष्य को सम्पूर्ण इन्द्रियों को भली-भांति वश में रखना चाहिए।
स्वामी शिवानन्द जी कहते हैं- “जितेन्द्रिय बनकर शांत मन से मुझ में चित्त एकाग्र करके आसन में बैठना चाहिए। इस प्रकार प्रतिष्ठित योगी जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है, निःसंदेह अत्यंत स्थिर है। वह आत्मा में स्थित है।”
श्री शंकराचार्य ने आसीत मत्परः’की व्याख्या इस प्रकार की है- “उसे यह ध्यान करते हुए बैठना चाहिए कि ‘मैं उस (परमात्मा) से पृथक नहीं हूँ।”14
मन एवं इन्द्रियों के वश में न होने से तथा विषयों के चिन्तन से क्रोध, आसक्ति आदि अवगुणों की उत्पत्ति होती है तथा क्रोध के परिणाम स्वरूप अधोपतन होता है, यह कथन अर्जुन को स्पष्ट करते हुए भगवान विश्वम्भर अगले श्लोक में अपने स्नेहवचनों की वर्षा करते हुए कहते हैं -
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमरू ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।।15
अर्थात् क्रोध से अत्यंत मूढ़भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जान से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है।
क्रोध उत्पन्न होने पर व्यक्ति सम्मोह में पड़ जाता है और उसकी सोचने-समझने की शक्ति नष्ट हो जाती है और सम्मोह अर्थात् मूढ़भाव को प्राप्त हो जाता है, जिसके कारण उसको स्मृति नहीं रह जाती कि वह कौन है? क्या करना है? आदि। स्मृति भ्रमित होने पर बुद्धि का विनाश हो जाता है अर्थात् कर्तव्य-अकर्तव्य का निर्धारण नहीं कर पाता और अंततः पतन की ओर अग्रसर हो जाता है, जिस प्रकार रावण का हुआ था।
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति चलता कैसे है?
राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करनेवालों को प्रसाद की प्राप्ति होने, उससे समस्त दुःखों का नाश होने तथा शीघ्र ही उसकी बुद्धि स्थिर होने के विषय में बतलाते हुए अर्जुन के स्थिरबुद्धि पुरुष के विषय में पूछे गये चौथे प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान नारायण श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में आनन्ददायक स्वर में कहते हैं -
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ।।16
अर्थात् परन्तु अपने अधीन किये हुए अंतःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष से रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अंतःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है।
इन्द्रियों को वश में किये हुए साधक में राग-द्वेष, काम-क्रोध का अभाव होता है, जिसके कारण वह अपने वर्ण, अवस्था, परिस्थिति आदि के अनुसार भोगों में वह राग-द्वेष से रहित होकर इन्द्रियों के द्वारा विषयों में विचरण करता है। उसके समस्त इन्द्रिय व्यवहार नियमित एवं शास्त्र सम्मत होते हैं। जो मनुष्य मन को वश में रखता है वह इन्द्रियों के विषयों का भोग करने पर भी राग और द्वेष से मुक्त रहता है और भगवद्कृपा प्राप्त करता है। श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के अगले श्लोक में भगवान् नारायण अपनी प्रेममयी वाणी में अर्जुन से कहते हैं -
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ।।17
अर्थात् अंतःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्न चित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभांति स्थिर हो जाती है।
वायु और नौका के उदाहरण द्वारा मन के संयोग से इन्द्रिय को बुद्धि का हरण करनेवाली बतलाते हुए भगवान हृषिकेश श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में अर्जुन को अपनी प्रेममयी वाणी में कहते हैं -
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ।।18
अर्थात् जल में चलने वाली नाव वायु जैसे हर लेती है, वैसे ही विषयों में विरचती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है।
स्थिरबुद्धि पुरूष के लक्षणों में इन्द्रियनिग्रह की प्रधानता बतलाते हुए भगवान कमलनयन अर्जुन पर अपने कृपावचनों की वर्षा करते हुए श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में कहते हैं -
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।19
अर्थात इसलिए हे महाबाहो ! जो पुरुष की इन्द्रियां इन्द्रियों के विषयों से सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है।
साधारण मनुष्यों के लिये ब्रह्मानन्द को और तत्त्ववेत्ता पुरूष के लिये विषयसुख को रात्रि के समान बतलाते हुए भगवान पद्मनाभ अपने आनन्दमय स्वर में श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में कहते हैं -
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ।।20
अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है ।।
यहाँ भगवान् ने स्थितप्रज्ञ और सामान्य मनुष्यों में अंतर बताते हुए कहा है कि स्थितप्रज्ञ परमात्मा के लिए जागता है, और जिस संसार की प्राप्ति के लिए सामान्य मनुष्य जागते हैं वह उसके लिए घोर निशा के सामान है। डॉ. प्रणव पंड्या ने इसकी व्यावहारिक युगानुकुल व्याख्या करते हुए कहा है - सामान्य जन फल के प्रति जागरूक रहते हैं, कर्तव्य के प्रति सोते हैं, किन्तु स्थितप्रज्ञ केवल फल के प्रति सोता है, कर्तव्य के विषय में जागृत रहता है।21
समुद्र के उदाहरण से ज्ञानी महापुरुषों की महिमा बतलाते हुए भगवान चक्रपाणि श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में अर्जुन को अपनी ज्ञानमयी वाणी से मोहित करते हुए कहते हैं -
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं, समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे, स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ।।22
अर्थात् जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किये बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परमशांति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं।
जिस प्रकार से समुद्र उसमें निरन्तर मिलने वाली नदियों के जल के प्रवाह से विक्षुब्ध नहीं होता उसी प्रकार से ज्ञानी अपने चारों ओर इन्द्रियों के विषयों के आवेग के पश्चात भी शांत रहता है, न कि उस मनुष्य की भांति जो कामनाओं को तुष्ट करने के प्रयास में लगा रहता है। जिस मनुष्य में इन्द्रिय भोग, नदियों की भांति समा जाएँ पर वह शांत बना रहे, उसमें कोई हलचल, विकार अर्थात् इच्छा-कामना, राग-द्वेष न उठे वही शांति को प्राप्त होता है अर्थात् वही स्थितप्रज्ञ है।
आचार्य श्रीधर कहते हैं - भोग के द्वारा अविक्रियमाण अंतर्दृष्टि संपन्न मुनि के भीतर समस्त कामनाएँ प्रारब्धवश आक्षिप्त होकर विलीन हो जाती है। वही मुनि शांति या कैवल्य प्राप्त करते हैं।
डॉ प्रणव पंड्या कहते हैं - “स्थितप्रज्ञ एक समुद्र की तरह धीर गंभीर व्यक्तित्व वाला होता है। अनेकों कामनाओं, कामाभावों के अन्दर प्रविष्ट होने पर भी स्थितप्रज्ञ विचलित नहीं होता, शांत बना रहता है।“23
कामना, स्पृहा, ममता और अहंकार आदि से रहित होकर विचरने वाले पुरूष को परम शान्ति की प्राप्ति होती है यह कथन अर्जुन को समझाते हुए भगवान जनार्दन श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के अगले श्लोक में अपने सुमधुर कण्ठ से ये सुवचन कहते हैं -
विहाय कामान्यरूसर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ।।24
अर्थात हे अर्जुन! जो पुरूष सम्पूर्ण कामनाओं को त्यागकर ममतारहित, अहंकाररहित और इच्छारहित हुआ विचरता है, वही शान्ति को प्राप्त होता है अर्थात वह शान्ति को प्राप्त है।
यहाँ कामान’शब्द समस्त भोगों वासनाओं से सदा सर्वदा रहित हो जाने का संकेत है। अपने शरीर को सबकुछ समझना तथा उसी के लिए करना देहाभिमान है, इसी का नाम अहंकार है। भगवान् ने इस देहाभिमान से परे हो जाने की बात कही है। शरीर सहित शरीर से सम्बन्ध रखने वाले बन्धु-बान्धवों तथा पदार्थों में अपनत्व का भाव ममता है इससे रहित होना निर्मम होना है। किसी वस्तु की प्राप्ति की इच्छा का नाम स्पृहा है, उसे त्याग देना निःस्पृहता है। इस प्रकार इन तीनों भावों से रहित कर्तव्य भाव से लोक संग्रह के लिए विचरण करने वाला ही शांति को प्राप्त होता है।
डॉ. प्रणव पंड्या कहते हैं - “साधक की स्थिति में जीने से अहंता चली जाती है तो मात्र शांति ही शांति रह जाती है।“25
स्थितप्रज्ञता का परिणाम:-
भगवान् ने स्थितप्रज्ञता का परिणाम ब्राह्मी स्थिति को बताया है। ब्राह्मी स्थिति के माहात्म्य का वर्णन करते हुए भगवान कमलनेत्र श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के अन्त में अर्जुन को अपनी कृपादायक वाणी में सदवचनों से मोहित करते हुए कहते हैं -
एषा ब्राह्मी स्थितरूपार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थितवास्यामन्तकालेेपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ।।26
अर्थात हे अर्जुन ! यह ब्रह्म को प्राप्त पुरुष की स्थिति है इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अन्तकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है।
सर्वस्व त्याग और ब्रह्म में स्थिति हो, जो ब्रह्मविषयक स्थिति हो उसे ‘ब्राह्मी स्थिति’ कहते हैं। जो मनुष्य जीवित अवस्था में ही इस स्थिति को प्राप्त कर लेता है अर्थात् अहंकार, ममता, आसक्ति, स्पृहा और कामना से रहित हो जाता है, उस स्थितप्रज्ञ मनुष्य को ब्राह्मी स्थिति की प्राप्ति हो जाती है, वह परमानन्द में जीता है। परमात्मा से एकाकार हुआ अनुभव करता है।
स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं- “भगवान् ने यहाँ ब्राह्मी स्थिति बताई है। तात्पर्य यह है कि वह व्यक्तिगत स्थिति नहीं है अर्थात् उसमें व्यक्ति तत्व नहीं है, नित्ययोग की प्राप्ति है।”
डॉ. प्रणव पंड्या जी कहते हैं - “सिद्ध पुरुष जिसमें निवास करते हैं, चेतना की उस अवस्था को ब्राह्मी स्थिति कहा गया है। यह उच्च चेतना के जागरण की भगवान् चेतना के अतिचेतन में अवतरण की प्रक्रिया का नाम है। ... यह स्थिति स्थितप्रज्ञ की हमेशा टिकने वाली सहजावस्था का नाम है।”27
आचार्य श्रीधर जी के अनुसार - “हे पार्थ ! यही ब्राह्मी स्थिति है, ब्रह्मनिष्ठा है।”
जयदयाल गोयन्दका जी कहते हैं - “सर्वथा निर्विकार निश्चल भाव से सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में नित्य निरंतर निमग्न रहना ही उस स्थिति को प्राप्त करना है।
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत ।।28
अर्थात् जो मनुष्य कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है, वह योगी सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।।
स्थितप्रज्ञ मनुष्य ब्राह्मी स्थिति में होता है। वह समस्त मनोविकारों से रहित होता है, कामना से रहित होता है। वह सत्य को भीतर से अनुभव करता है।
संदर्भ सूची:-
1- श्रीमद्भागवद्गीता 2.55
2- आचार्य शंकर, शांकरभाष्य
3- डॉ० प्रणव पण्डया, युगगीता भाग-1, युग निर्माण योजना विस्तार ट्रस्ट, गायत्री तपोभूमि मथुरा, उत्तरप्रदेश
4- श्रीमद्भागवद्गीता 2.56
5- डॉ० प्रणव पण्डया, युगगीता भाग-1, युग निर्माण योजना विस्तार ट्रस्ट, गायत्री तपोभूमि मथुरा, उत्तरप्रदेश
6- श्रीमद्भागवद्गीता 2.57
7- भूपेंद्र सान्याल, गीता प्रखंड,
8- श्रीमद्भागवद्गीता 2.58
9- डॉ० प्रणव पण्डया, युगगीता भाग-1, युग निर्माण योजना विस्तार ट्रस्ट, गायत्री तपोभूमि मथुरा, उत्तरप्रदेश पृष्ठ-71-72
10- श्रीमद्भागवद्गीता 2.59
11- श्रीमद्भागवद्गीता 2.60
12- श्रीमद्भागवद्गीता 2.61
13- निरूपण-प्प्.64
14- श्रीमद्भागवद्गीता 2.63
15- श्रीमद्भागवद्गीता 2.64
16- श्रीमद्भागवद्गीता 2.65
17- श्रीमद्भागवद्गीता 2.67
18- श्रीमद्भागवद्गीता 2.68
19- श्रीमद्भागवद्गीता 2.69
20- डॉ० प्रणव पण्डया, युगगीता भाग-1, युग निर्माण योजना विस्तार ट्रस्ट, गायत्री तपोभूमि मथुरा, उत्तरप्रदेश
21- श्रीमद्भागवद्गीता 2.70
22- डॉ० प्रणव पण्डया, युगगीता भाग-1, युग निर्माण योजना विस्तार ट्रस्ट, गायत्री तपोभूमि मथुरा, उत्तरप्रदेश
23- श्रीमद्भगवद्गीता 2.71
24- डॉ० प्रणव पण्डया, युगगीता भाग-1, युग निर्माण योजना विस्तार ट्रस्ट, गायत्री तपोभूमि मथुरा, उत्तरप्रदेश, पृष्ठ-91
25- श्रीमद्भगवद्गीता 2.72
26- डॉ० प्रणव पण्डया, युगगीता भाग-1, युग निर्माण योजना विस्तार ट्रस्ट, गायत्री तपोभूमि मथुरा, उत्तरप्रदेश
27- श्रीमद्भागवद्गीता 4.18
28- न्यायदर्शनम, आचार्य उदयवीर शास्त्री, प्रकाशक विजयकुमार गोविंदराम हासानन्द, दिल्ली, पृष्ठ 251
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Received on 14.11.2024 Revised on 09.01.2025 Accepted on 17.02.2025 Published on 25.03.2025 Available online from March 31, 2025 Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2025; 13(1):6-14. DOI: 10.52711/2454-2687.2025.00002 ©A and V Publications All right reserved
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